जस्टिस कौल की किताब से विवाद: पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ बोले- फैसले सर्वसम्मत थे
1:45 PM, Oct 26, 2026
R Express भारत
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पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ और रिटायर्ड जस्टिस संजय किशन कौल के बीच कॉलेजियम प्रणाली को लेकर सामने आया वैचारिक मतभेद इन दिनों कानूनी और प्रशासनिक हलकों

sketch by - ( AI )
उत्तर प्रदेश। पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ और रिटायर्ड जस्टिस संजय किशन कौल के बीच कॉलेजियम प्रणाली को लेकर सामने आया वैचारिक मतभेद इन दिनों कानूनी और प्रशासनिक हलकों में गहरी चर्चा का विषय बना हुआ है। यह पूरा घटनाक्रम जस्टिस कौल की आगामी संस्मरण पुस्तक में किए गए कुछ दावों के बाद शुरू हुआ, जिस पर पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट की है। दोनों शीर्ष कानूनी दिग्गजों के बयानों ने न्यायपालिका की आंतरिक कार्यप्रणाली और नियुक्तियों की प्रक्रिया को एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
पूर्व जस्टिस कौल की पुस्तक के मुख्य अंश
प्रख्यात कानूनी विशेषज्ञ जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी किताब में शीर्ष अदालत के भीतर जजों के चयन की प्रक्रिया पर कुछ सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि, जजों के चयन और नियुक्तियों के संदर्भ में तत्कालीन प्रशासनिक नेतृत्व का रुख कार्यपालिका के प्रति आवश्यकता से अधिक लचीला था। पुस्तक में दावा किया गया है कि आधिकारिक बैठकों से पहले ही संभावित नामों पर कार्यपालिका के साथ सहमति बनाने की एक नई परिपाटी शुरू हो गई थी।उन्होंने एक विशिष्ट घटना का उल्लेख किया जहां पांच नामों पर सहमति बनने के बाद आखिरी क्षणों में एक अन्य नाम को शामिल करने की कोशिश की गई, जिस पर उन्होंने आपत्ति जताई थी।इसके अतिरिक्त, उन्होंने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुकदमे को अचानक उनकी पीठ से दूसरी पीठ में भेजे जाने पर भी आश्चर्य व्यक्त किया था।
पूर्व सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ का पक्ष
इन दावों के सामने आने के बाद पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने एक साक्षात्कार में संस्थान की गरिमा और निर्णयों की वैधता को रेखांकित करते हुए अपनी बात रखी, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक समिति द्वारा लिए गए सभी निर्णय सामूहिक और सर्वसम्मत थे। आधिकारिक दस्तावेजों में कभी कोई विरोध दर्ज नहीं कराया गया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि जजों की नियुक्ति से जुड़े सभी प्रस्ताव और उनके पीछे के कारण हमेशा आधिकारिक पोर्टल पर सार्वजनिक किए जाते रहे हैं, जिन पर सभी संबंधित सदस्यों के हस्ताक्षर होते थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जजों की नियुक्ति की संवैधानिक व्यवस्था में कार्यपालिका की राय को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि अंतिम वारंट राष्ट्रपति द्वारा ही जारी किया जाता है।
विमर्श का निष्कर्ष
यह वैचारिक टकराव देश में जजों की नियुक्ति करने वाली संस्थागत व्यवस्था की आंतरिक बहसों को दर्शाता है। जहां एक पक्ष प्रक्रिया की स्वतंत्रता और कड़े रुख की वकालत कर रहा है, वहीं दूसरा पक्ष व्यावहारिक तालमेल और आधिकारिक रिकॉर्ड की प्रामाणिकता को प्राथमिकता दे रहा है। कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के विमर्श से आने वाले समय में चयन प्रक्रियाओं को और अधिक पारदर्शी बनाने में मदद मिल सकती है।

