बेटा नहीं तो बेटी को मुखाग्नि का अधिकार, गरुड़ पुराण में है जिक्र
4:32 PM, Sep 19, 2026
R Express भारत
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सनातन धर्म में किसी के चले जाने के बाद उसका अंतिम संस्कार करना सबसे पवित्र और जरूरी काम माना गया है। आमतौर पर हमारे समाज में यही देखा जाता है कि घर का बेटा

sketch by - ( AI )
उत्तर प्रदेश।सनातन धर्म में किसी के चले जाने के बाद उसका अंतिम संस्कार करना सबसे पवित्र और जरूरी काम माना गया है। आमतौर पर हमारे समाज में यही देखा जाता है कि घर का बेटा या कोई पुरुष रिश्तेदार ही चिता को मुखाग्नि देता है। लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जब परिवार में कोई बेटा नहीं होता। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि अब अंतिम संस्कार कौन करेगा? गरुड़ पुराण में इस मुश्किल स्थिति का बहुत ही व्यावहारिक और स्पष्ट समाधान दिया गया है।
शास्त्रों के अनुसार, अगर किसी परिवार में बेटा नहीं है, तो वहां की बेटियां भी माता-पिता का अंतिम संस्कार कर सकती हैं और चिता को मुखाग्नि दे सकती हैं। सनातन धर्म के नियम कभी भी किसी को संकट में डालने के लिए नहीं बने हैं, बल्कि वे समय और परिस्थिति के हिसाब से रास्ता दिखाते हैं। कुल की परंपरा को आगे बढ़ाने और माता-पिता की आत्मा की शांति के लिए बेटियां इस आखिरी जिम्मेदारी को पूरी श्रद्धा के साथ निभा सकती हैं।
परिस्थिति के हिसाब से बदल जाते हैं नियम
गरुड़ पुराण में साफ कहा गया है कि किसी भी इंसान की अंतिम यात्रा में रुकावट नहीं आनी चाहिए। अगर घर में कोई पुरुष सदस्य मौजूद नहीं है, तो बेटियों को यह अधिकार पूरी तरह मिलता है। इतिहास और पुराणों में भी ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जहाँ महिलाओं ने आगे बढ़कर अपने पारिवारिक दायित्वों को निभाया है। यह नियम साबित करता है कि सनातन संस्कृति कितनी खुली सोच रखती है और इसमें सामाजिक व पारिवारिक हालातों को कितना महत्व दिया गया है।

