केजरीवाल की पार्टी और DMK ने बनाई दूरी, क्या रामलीला मैदान में बिखर गई विपक्षी एकजुटता?
5:59 PM, Oct 31, 2026
R Express भारत
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दिल्ली का रामलीला मैदान एक बार फिर सियासी हलचल का केंद्र बना हुआ है। विपक्षी पार्टियों के महामोर्चे यानी 'INDIA' गठबंधन ने चुनाव आयोग और वोटर लिस्ट की री-च

photo by - ( chat GPT )
दिल्ली का रामलीला मैदान एक बार फिर सियासी हलचल का केंद्र बना हुआ है। विपक्षी पार्टियों के महामोर्चे यानी 'INDIA' गठबंधन ने चुनाव आयोग और वोटर लिस्ट की री-चेकिंग के तौर-तरीकों के खिलाफ एक बहुत बड़ी रैली का आयोजन किया है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस भीड़ को लोकतंत्र और संविधान बचाने की लड़ाई में एक बड़ी कामयाबी के रूप में देख रहे हैं। मंच से बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं कि देश की जनता अब उनके साथ खड़ी है, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे की कहानी कुछ और ही इशारा कर रही है।
रैली में जुटी भीड़ जितनी चर्चा में है, उससे कहीं ज्यादा चर्चा उन कुर्सियों की है जो खाली रह गईं या जिन पर बड़े नेताओं को होना चाहिए था। गठबंधन के कई सबसे मजबूत स्तंभ माने जाने वाले क्षेत्रीय दल इस मंच से पूरी तरह नदारद दिखे। आम आदमी पार्टी, डीएमके, बीजू जनता दल और एआईएमआईएम जैसे बड़े नामों ने इस रैली से पूरी तरह दूरी बना ली है, जिससे इस विपक्षी एकता के गुब्बारे की हवा निकलती दिख रही है।
'AAP' के बड़े नेताओं ने साफ कर दिया है कि वे इस आयोजन का हिस्सा नहीं हैं। संजय सिंह का कहना है कि पार्टी पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि वह 'INDIA' गठबंधन का हिस्सा नहीं है। दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस और 'AAP' के बीच जो सियासी जंग चल रही है, उसकी कड़वाहट अब खुलकर सामने आ गई है। दूसरी तरफ, दक्षिण भारत के सबसे बड़े चेहरे यानी तमिलनाडु की सत्ता संभाल रही 'DMK' की गैर-मौजूदगी ने भी सबको चौंकाया। अंदरूनी सूत्रों की मानें तो तमिलनाडु के हालिया सियासी बदलावों और कांग्रेस के कुछ कदमों से द्रमुक नेतृत्व खुश नहीं है, इसलिए उन्होंने इस मंच से किनारा करना ही बेहतर समझा।
यही हाल ओडिशा की 'BJD' का भी रहा, जो मुद्दों पर तो साथ दिखती है लेकिन गठबंधन के औपचारिक मंचों से दूर रहती है। इस बिखराव पर सत्तापक्ष यानी भाजपा को बैठे-बिठाए एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि यह गठबंधन सिर्फ एक दिखावा है, जिसमें न तो कोई साझा विचार है और न ही कोई मजबूत तालमेल। इसके जवाब में भाजपा ने भी 'लोकतंत्र बचाओ' के नारे के साथ सड़कों पर उतरने का फैसला किया है।
इस पूरे सियासी ड्रामे के बीच आम लोग और दिल्ली के कारोबारी भी परेशान हैं। त्योहारी सीजन के चलते बाजारों में भीड़ है और इस बड़ी रैली की वजह से हुए ट्रैफिक जाम ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कुल मिलाकर, कांग्रेस और राहुल गांधी भले ही इस रैली को एक बड़ी जीत मान रहे हों, लेकिन धरातल पर बड़े क्षेत्रीय दलों का इस तरह मुंह मोड़ लेना यह साफ करता है कि 2026 की राजनीति में विपक्षी एकजुटता का रास्ता अभी बहुत पथरीला है।

