इलाज की आस में फुटपाथ पर जिंदगी: अस्पताल के चक्कर काटते-काटते कर्ज के दलदल में धंसी मां
7:36 PM, Jul 6, 2026
R Express भारत
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जब घर का कोई सदस्य बीमार पड़ता है, तो पूरा परिवार मानसिक रूप से टूट जाता है। लेकिन जब बीमारी के साथ भयंकर गरीबी भी दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाए, तो जिंदगी कि

अस्पताल के चक्कर काटते-काटते कर्ज के दलदल में धंसी मां फोटो सौ0 RExpress भारत
लखनऊ। जब घर का कोई सदस्य बीमार पड़ता है, तो पूरा परिवार मानसिक रूप से टूट जाता है। लेकिन जब बीमारी के साथ भयंकर गरीबी भी दरवाजे पर आकर खड़ी हो जाए, तो जिंदगी किसी नरक से कम नहीं लगती। कुछ ऐसी ही बेबसी और आंसुओं की कहानी है बिहार के सिवान की रहने वाली राजमती की, जो इन दिनों अपनों की जान बचाने के लिए लखनऊ के सबसे बड़े अस्पताल परिसर की सड़कों और फुटपाथों पर दिन काटने को मजबूर हैं। डेढ़ साल से चल रहे इस इलाज ने उन्हें अपनों के सामने तो लाचार बनाया ही, साथ ही लाखों रुपये के कर्ज के बोझ तले भी दबा दिया है।
राजमती की मुश्किलें करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुईं, जब उनके पेट में एक गांठ का पता चला। आनन-फानन में डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह दी। जमीन-जेवर जो कुछ था, सब दांव पर लगाकर राजमती का ऑपरेशन तो हो गया, लेकिन दर्द से मुक्ति नहीं मिली। ऑपरेशन के बाद से ही उन्हें लगातार डॉक्टरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। राजमती जब भी उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचती हैं, डॉक्टरों की तरफ से एक नई जांच की पर्ची थमा दी जाती है।
फुटपाथ बना ठिकाना, 15-15 दिन का लंबा इंतजार
राजमती बताती हैं कि, अस्पताल में पैर रखने की जगह नहीं होती। एक अदद जांच कराने और उसकी रिपोर्ट डॉक्टरों को दिखाने में ही 15 से 20 दिन का समय लग जाता है। इतने दिनों तक शहर में रुकने या किसी होटल का खर्च उठाना उनके बस की बात नहीं है। नतीजतन, भीषण गर्मी, धूल और मच्छरों के बीच वे अस्पताल के बाहर फुटपाथ को ही अपना आशियाना बनाने पर मजबूर हैं। फुटपाथ पर रहकर दिन गुजारना और रातें काटना अब उनकी मजबूरी बन चुका है।
मुसीबतों का पहाड़ यहीं नहीं रुका। अभी राजमती खुद पूरी तरह ठीक भी नहीं हुई थीं कि उनके बेटे अर्जुन के पेट में भी गंभीर दिक्कत शुरू हो गई। अब मां और बेटे दोनों का इलाज इसी अस्पताल से चल रहा है। एक तरफ खुद की बीमारी का दर्द और दूसरी तरफ जवान बेटे की तकलीफ, राजमती पूरी तरह टूट चुकी हैं।
बाहर की महंगी दवाइयां और जांच ले रही हैं जान
राजमती का आरोप है कि अस्पताल बड़ा जरूर है, लेकिन गरीबों के लिए राहत बहुत कम है। डॉक्टरों से बार-बार मिन्नतें करने और रोने-गिड़गिड़ाने के बाद बमुश्किल एक-दो दवाइयां अंदर से मिल पाती हैं, लेकिन बेटे की ज्यादातर दवाइयां आज भी बाहर के निजी मेडिकल स्टोर से ही खरीदनी पड़ रही हैं। हद तो तब हो गई जब उन्हें जरूरी जांचें भी बाहर से कराने को कह दिया गया। पिछले शनिवार को ही उन्होंने भारी मन से बेटे का अल्ट्रासाउंड बाहर की एक निजी लैब से कराया। बाहर की जांचें इतनी महंगी हैं कि गरीब इंसान की पूरी जमापूंजी एक बार में ही खत्म हो जाए।
लाखों का कर्ज और व्यवस्था से नाराजगी
राजमती रोते हुए कहती हैं, "अब तक अपने और बेटे के इलाज में लाखों रुपये लग चुके हैं। यह सारा पैसा लोगों के आगे हाथ फैलाकर, मिन्नतें करके और भारी ब्याज पर उधार लेकर जुटाया है। कर्ज देने वाले अब पैसे वापस मांग रहे हैं, लेकिन हमारे पास खाने तक के पैसे नहीं हैं।" बड़े अस्पताल की इस अव्यवस्था और संवेदनहीनता से राजमती बेहद दुखी और नाखुश हैं। उनका यह दर्द यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वाकई बड़े अस्पतालों की चमक के पीछे गरीबों की चीखें सुनने वाला कोई नहीं है।

