महर्षि दयानंद सरस्वती: समाज सुधार की वो मशाल जिसने देश को जगाया
3:45 PM, Oct 30, 2026
R Express भारत
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इतिहास के पन्नों में आज का दिन बेहद खास और प्रेरणादायी है। आज पूरा देश और दुनिया भर में फैले सनातनी समाज सुधार की सबसे बड़ी मशाल, महर्षि दयानंद सरस्वती को

photo by - ( chat GPT )
इतिहास के पन्नों में आज का दिन बेहद खास और प्रेरणादायी है। आज पूरा देश और दुनिया भर में फैले सनातनी समाज सुधार की सबसे बड़ी मशाल, महर्षि दयानंद सरस्वती को याद कर रहा है। वैदिक संस्कृति को दोबारा जीवित करने वाले और समाज में फैली बुराइयों पर कड़ा प्रहार करने वाले महर्षि दयानंद का योगदान आज भी हर पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक की तरह काम कर रहा है। आज देश के कोने-कोने में धार्मिक और सामाजिक मंचों पर उनके विचारों को याद कर उन्हें नमन किया जा रहा है।
पाखंड और अंधविश्वास पर किया सीधा प्रहार
महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म एक ऐसे दौर में हुआ था जब समाज में कुरीतियां, छुआछूत, बाल विवाह और अंधविश्वास चरम पर थे। उन्होंने किसी भी तरह के पाखंड के आगे झुकने से इनकार कर दिया। उन्होंने देश को "वेदों की ओर लौटो" का एक ऐसा मंत्र दिया, जिसने सोए हुए समाज को जगाने का काम किया। उनका मानना था कि वेद ही ज्ञान के असली स्रोत हैं और उन्हीं के रास्ते पर चलकर एक सच्चे समाज का निर्माण हो सकता है।
आर्य समाज से आई बदलाव की आंधी
साल 1875 में महर्षि दयानंद ने मुंबई में 'आर्य समाज' की नींव रखी। यह सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति की शुरुआत थी। इसके जरिए उन्होंने जन्म के आधार पर तय होने वाले जातिवाद का जमकर विरोध किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इंसान अपने कर्मों से बड़ा बनता है, अपनी जाति से नहीं। इसके साथ ही उन्होंने महिलाओं की शिक्षा की वकालत की और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ मोर्चा खोला।
स्वराज्य की अलख जगाने वाले पहले महापुरुष
बहुत कम लोग जानते हैं कि देश की आजादी के आंदोलनों में जो 'स्वराज्य' शब्द गूंजा, उसकी पहली हुंकार महर्षि दयानंद सरस्वती ने ही भरी थी। अपने मशहूर ग्रंथ 'सत्यार्थ प्रकाश' में उन्होंने खुलकर लिखा था कि कोई विदेशी हुकूमत चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह अपने खुद के स्वदेशी राज्य की जगह कभी नहीं ले सकती। उनके इसी राष्ट्रवाद ने आगे चलकर आजादी के दीवानों में नया जोश भरा था।
आज उनके निर्वाण दिवस पर देश के अलग-अलग हिस्सों में सेमिनार, हवन-पूजन और गोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है। सोशल मीडिया से लेकर ज़मीन तक, लोग उनके विचारों को साझा कर रहे हैं। आज के इस दौर में भी उनके विचार उतने ही प्रासंगिक हैं जितने डेढ़ सौ साल पहले थे।

