नाना पाटेकर का अचानक निधन, पुणे के फार्महाउस पर हुआ अंतिम संस्कार
6:09 PM, Oct 9, 2026
R Express भारत
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सिनेमा जगत से एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। अपनी कड़क आवाज़ और दमदार एक्टिंग से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले दिग्गज अभिनेता नाना पा

sketch by - ( chat GPT )
सिनेमा जगत से एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। अपनी कड़क आवाज़ और दमदार एक्टिंग से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा स्थित उनके घर पर उन्हें दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्ट) पड़ा, जिसके बाद वह हमेशा के लिए खामोश हो गए। उनके अचानक चले जाने से बॉलीवुड से लेकर मराठी सिनेमा तक और देश भर में फैले उनके फैंस के बीच शोक की लहर दौड़ गई है।
गोवा के घर में बिगड़ी तबीयत
पारिवारिक सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नाना पाटेकर गोवा के डोना पाउला इलाके में अपने आवास पर थे। तड़के सुबह अचानक उनकी तबीयत खराब हुई और वह बेहोश हो गए। आनन-फानन में उन्हें गोवा के पास स्थित मणिपाल अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में डॉक्टरों की एक स्पेशल टीम ने करीब 45 मिनट तक सीपीआर देकर उनकी धड़कनें वापस लाने की पूरी कोशिश की, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ और डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि अस्पताल पहुँचने से पहले ही उनका निधन हो चुका था।
पैतृक गाँव में दी गई अंतिम विदाई
नाना पाटेकर की यह आखिरी इच्छा थी कि, उनका अंतिम संस्कार किसी बड़े शहर में तड़क-भड़क के साथ न होकर, उनके अपने गाँव की मिट्टी में हो। उनकी इसी इच्छा का सम्मान करते हुए उनके पार्थिव शरीर को गोवा से विशेष विमान के ज़रिए पुणे लाया गया। पुणे के पास स्थित उनके डोंजे गाँव वाले फार्महाउस 'नानाची वाड़ी' में उनका अंतिम संस्कार किया गया।
चूंकि पार्थिव शरीर को गोवा से पुणे लाने में काफी वक्त लग गया था, इसलिए परिवार ने देर रात ही अंतिम संस्कार करने का फैसला किया। पूरे सम्मान के साथ पुलिस बल की मौजूदगी में उन्हें विदाई दी गई। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने नम आंखों से अपने पिता को मुखाग्नि दी। इस दुखद मौके पर मनोरंजन दुनिया के सितारों के साथ-साथ कई बड़े राजनेता और गाँव के हज़ारों लोग अपने चहेते अभिनेता को आखिरी बार देखने पहुँचे थे।
एक अमिट पहचान छोड़ गए नाना
1 जनवरी 1951 को जन्मे नाना पाटेकर ने साल 1978 में फिल्म 'गमन' से अपने अभिनय सफर की शुरुआत की थी। 'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'तिरंगा', 'अब्तक छप्पन' और 'वेलकम' जैसी फिल्मों में निभाए गए उनके किरदार हमेशा लोगों के ज़हन में ज़िंदा रहेंगे। फिल्मों के साथ-साथ वह अपनी सादगी और सामाजिक कार्यों के लिए भी जाने जाते थे। उन्होंने 'नाम फाउंडेशन' नाम की संस्था बनाकर महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में किसानों की बढ़-चढ़कर मदद की थी। उनके जाने से भारतीय कला जगत ने एक सच्चा हीरा खो दिया है।

