पीएम मोदी का संदेश: गरीब और विकासशील देशों को आगे बढ़ाने के लिए साथ आए ब्रिक्स
3:20 PM, Sep 13, 2026
R Express भारत
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दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा और कड़ा संदेश दिया है।

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उत्तर प्रदेश। दिल्ली के भारत मंडपम में चल रहे 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा और कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने दुनिया भर में चल रहे आपसी तनाव और लड़ाइयों पर गहरी चिंता जताई। पीएम मोदी ने साफ कहा कि, आज दुनिया के देशों के बीच जो तनाव चल रहा है, उसका सबसे बुरा असर आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है। इस मुश्किल वक्त में ब्रिक्स से जुड़े देशों को एक साथ आना होगा, ताकि गरीब और विकासशील देशों को आगे बढ़ने का पूरा मौका मिल सके।
तकनीक और खनिजों के गलत इस्तेमाल पर चिंता
इस सम्मेलन के दूसरे दिन अपने संबोधन में भारतीय प्रधानमंत्री ने एक बहुत ही जरूरी मुद्दे पर सबका ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि, आजकल कुछ ताकतें तकनीक और खास खनिजों (क्रिटिकल मिनरल्स) को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। यह तरीका बिल्कुल गलत है और इससे पूरी दुनिया की तरक्की रुक सकती है. अगर कुछ देश इन जरूरी चीजों को अपने कब्जे में रखेंगे, तो बाकी दुनिया का विकास कैसे होगा? इसलिए, तकनीक का फायदा हर छोटे-बड़े देश और समाज के आखिरी व्यक्ति तक समान रूप से पहुंचना चाहिए।
सिर्फ सरकारें नहीं, आम लोग भी जुड़ें
पीएम मोदी का मानना है कि ब्रिक्स सिर्फ बड़े नेताओं और सरकारों के मिलने-जुलने का मंच बनकर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने इस मंच का दायरा बढ़ाने की बात कही. प्रधानमंत्री ने प्रस्ताव रखा कि हमें छोटे कारोबारियों, नए स्टार्टअप्स, किसानों, कामकाजी महिलाओं और युवाओं को इस नेटवर्क से सीधे जोड़ना होगा। जब इन देशों के आम लोग, रिसर्चर और बिजनेसमैन आपस में मिलकर काम करेंगे, तभी सही मायने में सबका विकास हो पाएगा। इसके लिए उन्होंने एक खास पोर्टल बनाने का भी सुझाव दिया, जो छोटे व्यापारों को नया बाजार दिलाने में मदद करेगा।
नियम मानने वाले नहीं, नियम बनाने वाले बनें
भारत की मेजबानी में हो रहे इस दो दिनी सम्मेलन में पीएम मोदी ने विकासशील देशों यानी 'ग्लोबल साउथ' को मजबूत करने पर सबसे ज्यादा जोर दिया। उन्होंने एक बेहद असरदार बात कही कि अब वक्त आ चुका है जब इन देशों को 'नियमों को सिर्फ मानने वाले' की भूमिका से बाहर निकलकर खुद 'नियम तय करने वाले' की भूमिका में आना होगा। दुनिया के बड़े फैसले लेने वाली संस्थाओं में अब उन देशों की बात सुनी जानी चाहिए जो सालों से पीछे छूट गए हैं।
इस बैठक में भारत के इस रुख को काफी समर्थन मिल रहा है। सभी 11 सदस्य देशों ने नई दिल्ली घोषणापत्र को अपनी मंजूरी दे दी है, जो इस बात का सबूत है कि वैश्विक मंच पर भारत की साख कितनी मजबूत हो चुकी है।

