श्राद्ध 2026: तिथियों का अनोखा फेरबदल, एक साथ मना चौथ और पंचमी का श्राद्ध
5:24 PM, Oct 1, 2026
R Express भारत
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सनातन धर्म में पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए पितृ पक्ष का विशेष महत्व है। इस साल पंचांग के अद्भुत गणित और तिथियों के फेरबदल के कारण

sketch by - ( AI )
उत्तर प्रदेश। सनातन धर्म में पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए पितृ पक्ष का विशेष महत्व है। इस साल पंचांग के अद्भुत गणित और तिथियों के फेरबदल के कारण पितृ पक्ष में एक अनोखा संयोग देखने को मिला है। ज्योतिष गणना के अनुसार, इस बार चतुर्थी (चौथ) और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन संपन्न किया गया, जिसने श्रद्धालुओं और व्रत रखने वाले लोगों के बीच थोड़ी उत्सुकता और उलझन पैदा कर दी थी।
क्यों एक साथ मनाया गया दो तिथियों का श्राद्ध?
वैदिक पंचांग के अनुसार, बुधवार, 30 सितंबर 2026 को दोपहर 2 बजकर 55 मिनट तक चतुर्थी तिथि थी। इसके तुरंत बाद पंचमी तिथि की शुरुआत हो गई। धर्मशास्त्रों और निर्णय सिंधु जैसे ग्रंथों के नियमों के मुताबिक, पितरों के निमित्त तर्पण, पिंड दान और श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर के 'अपराह्न काल' (दोपहर 12:00 बजे से 3:45 बजे के बीच) में किया जाता है।
चूंकि अगले दिन यानी 1 अक्टूबर 2026 को दोपहर का श्राद्ध समय शुरू होने से पहले ही (दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर) पंचमी तिथि समाप्त हो रही थी, इसलिए विद्वानों और ज्योतिषाचार्यों ने सर्वसम्मति से 30 सितंबर को ही चतुर्थी और पंचमी दोनों का श्राद्ध एक साथ मनाने का निर्णय लिया। शास्त्रों के अनुसार, जिस दिन अपराह्न काल में तिथि मौजूद हो, उसी दिन उस तिथि का श्राद्ध करना शास्त्र सम्मत माना जाता है।
अंगारक संकष्टी चतुर्थी का महासंयोग
इस दिन का महत्व इसलिए भी कई गुना बढ़ गया क्योंकि तिथि के इस बदलाव के साथ ही 'अंगारक संकष्टी चतुर्थी' का बेहद फलदायी और पवित्र संयोग भी बना। भगवान गणेश की आराधना के लिए समर्पित संकष्टी चतुर्थी जब मंगलवार या बुधवार के संधिकाल में आती है, तो इसे अंगारक चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। पितृ कार्य के साथ-साथ गणपति बप्पा की आराधना का यह डबल संयोग जातकों के कष्टों को दूर करने और पितरों के आशीर्वाद से घर में सुख-समृद्धि लाने वाला माना गया है।
अब आगे कब हैं मुख्य श्राद्ध तिथियां?
30 सितंबर को दो तिथियों का श्राद्ध एक साथ बीत जाने के बाद, आज यानी 1 अक्टूबर 2026 को षष्ठी तिथि का श्राद्ध किया जा रहा है। यदि आप भी अपने पूर्वजों की तिथियों को लेकर असमंजस में हैं, तो आगे आने वाली प्रमुख तारीखों को नोट कर लें।
• 02 अक्टूबर (शुक्रवार): सप्तमी तिथि का श्राद्ध
• 03 अक्टूबर (शनिवार): अष्टमी तिथि का श्राद्ध
• 04 अक्टूबर (रविवार): नवमी श्राद्ध (इसे मातृ नवमी भी कहते हैं, इस दिन माताओं और परिवार की दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध किया जाता है)
• 06 अक्टूबर (मंगलवार): एकादशी श्राद्ध (इंदिरा एकादशी)
• 10 अक्टूबर (शनिवार): सर्वपितृ अमावस्या (इस दिन ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों का विसर्जन और श्राद्ध किया जाता है)
ज्योतिषियों का कहना है कि पितृ पक्ष के दौरान तिथियों का घटना-बढ़ना एक स्वाभाविक खगोलीय घटना है। पंचांग के इस गणित को समझकर सही समय पर किया गया तर्पण पितरों को सीधे तृप्त करता है।

