धर्मांतरण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: धर्म बदला तो खत्म हो जाएगा आरक्षण का फायदा
4:35 PM, Oct 24, 2026
R Express भारत
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देश में धर्मांतरण और आरक्षण के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति अपना मूल ध

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नई दिल्ली। देश में धर्मांतरण और आरक्षण के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति अपना मूल धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपनाता है, तो उसे पुरानी जाति के आधार पर मिलने वाले आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाएगा। कोर्ट के मुताबिक, हिंदू समाज की जाति व्यवस्था के तहत मिलने वाले सामाजिक पिछड़ेपन के फायदे, धर्म बदलने के बाद नए धर्म की सामाजिक व्यवस्था में अपने आप लागू नहीं होते हैं।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे एक धर्म से दूसरे धर्म में ट्रांसफर किया जा सके।
नए धर्म में लागू नहीं होगा पुराना पिछड़ापन
अदालत ने अपने फैसले में समझाया कि इस्लाम और ईसाई जैसे धर्मों में सभी को एक समान माना जाता है। वहां हिंदू समाज जैसी जाति व्यवस्था नहीं होती। इसलिए, जब कोई व्यक्ति हिंदू धर्म के किसी पिछड़े वर्ग से मुस्लिम या ईसाई बनता है, तो उसकी पुरानी जाति का पिछड़ापन नए धर्म में अपने आप नहीं चला जाता। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस पुराने आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें हिंदू धर्म के पिछड़े वर्ग से इस्लाम अपनाने वालों को सीधे 'पिछड़ा वर्ग मुस्लिम' कैटेगरी में आरक्षण देने की बात कही गई थी।
एससी दर्जे को लेकर भी स्थिति साफ
यह पहली बार नहीं है जब अदालत ने इस पर कड़ा रुख अपनाया है। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अनुसूचित जाति का दर्जा कानूनन सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वालों तक ही सीमित है। अगर कोई व्यक्ति इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाता है, तो उसका एससी दर्जा तुरंत खत्म हो जाता है, चाहे उसका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो। दर्जा खत्म होने के साथ ही, वह व्यक्ति एससी/एसटी एक्ट के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के दायरे से भी बाहर हो जाता है।
प्राइवेट संस्थाओं के सर्टिफिकेट मान्य नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि कोई भी प्राइवेट धार्मिक संस्था किसी व्यक्ति को जाति या पिछड़े वर्ग का सर्टिफिकेट जारी नहीं कर सकती। यह काम सिर्फ और सिर्फ सरकारी अधिकारियों का है। हालांकि, कोर्ट ने यह जरूर कहा कि अगर नए धर्म के भीतर ही कोई समुदाय पहले से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा हुआ है, तो उसे नियमों के तहत ओबीसी लिस्ट में शामिल करने पर विचार किया जा सकता है, लेकिन यह पुराने धर्म की जाति के आधार पर अपने आप नहीं मिलेगा।

