यूपी सियासत: ओवैसी का अल्टीमेटम फेल, अखिलेश ने बंद किए दरवाजे
1:30 PM, Sep 23, 2026
R Express भारत
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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। सूबे की राजनीति में उस वक्त एक नया मोड़ आ गया जब समाजवादी पार्टी क

sketch by - ( AI )
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। सूबे की राजनीति में उस वक्त एक नया मोड़ आ गया जब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ गठबंधन करने से साफ मना कर दिया। अखिलेश यादव के इस कड़े रुख के बाद अब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि, क्या विपक्ष का यह बिखराव एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी के लिए फायदे का सौदा साबित होगा।
ओवैसी का प्रस्ताव और अखिलेश का पुराना दांव
दरअसल, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को हराने के लिए एक बड़े मोर्चे की वकालत की थी। कानपुर और मुरादाबाद की अपनी हालिया रैलियों में ओवैसी ने खुले मंच से समाजवादी पार्टी को मिलकर चुनाव लड़ने का न्योता दिया था। ओवैसी ने विपक्षी दलों को सोचने के लिए 2 अक्टूबर तक का समय भी दिया था।
लेकिन अखिलेश यादव ने इस अल्टीमेटम और प्रस्ताव दोनों को दरकिनार कर दिया। सपा प्रमुख ने साफ कर दिया कि वे अपने मौजूदा साथियों, खासकर कांग्रेस के साथ ही चुनावी मैदान में उतरेंगे और किसी नए दल के लिए गठबंधन में कोई जगह नहीं है। अखिलेश अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर ही भरोसा जता रहे हैं।
'एम' शब्द पर छिड़ा सियासी घमासान
अखिलेश यादव के इनकार के बाद ओवैसी ने सपा के पीडीए नारे पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव मुस्लिमों के वोट तो चाहते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर 'मुस्लिम' शब्द का खुलकर इस्तेमाल करने से कतराते हैं। ओवैसी का कहना है कि सपा मुस्लिमों को सिर्फ एक वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती आ रही है, जबकि हिस्सेदारी देने के नाम पर पीछे हट जाती है।
क्या होगा मुस्लिम वोटों का समीकरण?
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर ओवैसी की पार्टी यूपी की मुस्लिम बहुल सीटों पर अपने उम्मीदवार अकेले उतारती है, तो इसका सीधा असर सपा-कांग्रेस के गठबंधन पर पड़ेगा।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और कई विश्लेषकों ने भी यह आशंका जताई है कि ओवैसी के अलग चुनाव लड़ने से मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण या बिखराव होना तय है। अगर यह पारंपरिक वोट बैंक बंटता है, तो विपक्षी खेमे को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को अपनी चुनावी रणनीति मजबूत करने में मिलेगा। अब देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में ओवैसी की अगली रणनीति क्या होती है।

