फौजी की संदिग्ध मौत पर बवाल; लखनऊ में शव सड़क पर रख आधी रात को हंगामा
2:23 PM, Aug 7, 2026
R Express भारत
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पूर्वोत्तर के अशांत राज्य मणिपुर की वादियों से उठी एक दर्दनाक खबर ने लखनऊ को हिलाकर रख दिया है। मणिपुर के मोतबंग बेस पर तैनात सीआरपीएफ के 37 वर्षीय जवान

फौजी की संदिग्ध मौत पर बवाल फोटो सौ0 RExpress भारत
लखनऊ। पूर्वोत्तर के अशांत राज्य मणिपुर की वादियों से उठी एक दर्दनाक खबर ने लखनऊ को हिलाकर रख दिया है। मणिपुर के मोतबंग बेस पर तैनात सीआरपीएफ के 37 वर्षीय जवान विनीत सिंह की रहस्यमयी मौत ने पूरे महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। गुरुवार की देर रात जैसे ही विनीत का शव लखनऊ के बुद्धेश्वर स्थित आदर्श विहार कॉलोनी पहुंचा, वहां मौजूद सैकड़ों लोगों का सब्र का बांध टूट गया। रोते-बिलखते रिश्तेदारों और गुस्साए पड़ोसियों ने शव को बीच सड़क पर रखकर दुबग्गा से अवध चौराहे को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग को पूरी तरह जाम कर दिया।
लगभग पांच घंटे तक लखनऊ की सड़कों पर चीख-पुकार और हंगामा मचता रहा। कानपुर हाईवे की तरफ जाने वाले वाहनों के पहिए पूरी तरह थम गए। आधी रात को उमड़े इस जनसैलाब की आंखों में सिर्फ आंसू नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ गहरा गुस्सा था। सड़क पर उतरे लोग सिर्फ एक ही बात पर अड़े थे—जब तक इस मौत की परतों को खोलने का ठोस वादा नहीं मिलता, तब तक शव को अंतिम विदाई के लिए नहीं ले जाया जाएगा।
बातचीत के महज 11 मिनट बाद ऐसा क्या बदला?
इस पूरी दुखद घटना की सबसे संदेहास्पद कड़ी वो आखिरी 11 मिनट हैं, जिसने इस मामले को एक गहरा राज बना दिया है। विनीत की पत्नी नेहा सिंह ने रोते हुए जो आपबीती सुनाई, उसने वहां मौजूद हर इंसान की रूह कंपा दी।
नेहा के मुताबिक, बीती 5 अगस्त की शाम ठीक 7 बजकर 36 मिनट पर उनकी विनीत से फोन पर लंबी बात हुई थी। विनीत बेहद डरे हुए और परेशान थे। उन्होंने बताया था कि उन्हें कई दिनों से तेज बुखार है और मौसम की मार के कारण उनका शरीर साथ नहीं दे रहा है। इसके साथ ही विनीत ने इस बात का भी रो-रोकर जिक्र किया था कि हाल ही में कैंप के भीतर और आसपास जो गोलीबारी की घटनाएं हुई हैं, उसकी वजह से वह भयानक मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था, "मैंने घर आने के लिए छुट्टी की गुहार लगाई थी, लेकिन बड़े अफसरों ने मेरी एक न सुनी। वे मुझे घर नहीं जाने दे रहे।"
चौंकाने वाली बात यह है कि इस बातचीत के खत्म होने के ठीक 11 मिनट बाद, यानी शाम 7 बजकर 47 मिनट पर नेहा के फोन पर मणिपुर कैंप से एक वॉट्सऐप कॉल आती है। दूसरी तरफ से एक अधिकारी ने बेहद सपाट लहजे में कहा कि विनीत अपनी बैरक के पीछे लहूलुहान हालत में गिरे हुए मिले हैं। इसके कुछ ही देर बाद उनकी मौत की खबर दे दी गई। सीआरपीएफ इसे खुदकुशी का नाम दे रही है, लेकिन नेहा का सीधा और खुला आरोप है कि, उनके पति को कैंप के कमांडेंट और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने मानसिक रूप से इस कदर प्रताड़ित किया कि, उनकी जान चली गई। नेहा ने तीखा सवाल उठाया, "विनीत के माथे पर गोली लगी है। जब मामला इतना संदिग्ध है, तो हम मणिपुर में गुपचुप तरीके से किए गए पोस्टमार्टम पर कैसे भरोसा कर लें?
लखनऊ की सड़कों पर भारी रस्साकशी
जैसे ही प्रताड़ना की यह कहानी लोगों के बीच पहुंची, बुद्धेश्वर की सड़कों पर भारी बवाल शुरू हो गया। लोग नारेबाजी करने लगे। परिवार की मांग बेहद साफ थी—विनीत का दोबारा लखनऊ में पोस्टमार्टम कराया जाए ताकि सच पर से पर्दा उठ सके। इसके साथ ही पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच हो, विनीत को वीर गति पाने वाले सैनिक का सम्मान मिले, परिवार को आर्थिक तन्हाई से बचाने के लिए मदद दी जाए और घर के एक सदस्य को पक्की नौकरी मिले।
सड़क पर मचे इस कोहराम की सूचना मिलते ही पुलिस महकमे के बड़े चेहरे—धनंजय कुशवाहा, शकील अहमद और आईपीएस अमित कुमावत भारी पुलिस बल और पीएसी के जवानों के साथ मौके पर दौड़ पड़े। अफसरों ने काफी देर तक हाथ-पैर जोड़े, मिन्नतें कीं और परिवार को रास्ते से हटने के लिए कहा, लेकिन न्याय की मांग पर अड़ी पत्नी नेहा और स्थानीय लोग अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए। करीब पांच घंटे तक चले इस कड़े टकराव के बाद, जब बड़े अधिकारियों ने यह लिखित भरोसा दिया कि वे इस पूरी मांग पत्र को तुरंत जिले के सबसे बड़े मुखिया की मेज तक पहुंचाएंगे और मौत की तह तक जाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेंगे, तब जाकर प्रदर्शनकारियों का गुस्सा शांत हुआ।
2009 में शुरू हुआ था सफर, हरदोई की मिट्टी में मिल गई खाक
देश सेवा का सपना लेकर विनीत सिंह साल 2009 में सीआरपीएफ का हिस्सा बने थे। केरल में अपनी शुरुआती ट्रेनिंग पूरी करने के बाद उन्होंने देश के कई संवेदनशील इलाकों में अपनी ड्यूटी निभाई। पिछले पांच सालों से वह अपनी पत्नी नेहा और 12 साल के मासूम बेटे रुद्र के साथ लखनऊ के पारा इलाके में अपना एक छोटा सा आशियाना बनाकर रह रहे थे। अभी हाल ही में, यानी बीते 23 जून को ही उनका तबादला जम्मू-कश्मीर से सीधे मणिपुर की इस 112वीं बटालियन में हुआ था। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि मणिपुर जाने के महज डेढ़ महीने के भीतर विनीत इस तरह तिरंगे में लिपटे हुए वापस आएंगे।
शनिवार को विनीत के पार्थिव शरीर को उनके पैतृक निवास—हरदोई जिले के बेनीगंज क्षेत्र के पुरवा बाजीराव गांव ले जाया गया। वहां जैसे ही विनीत का शव गाड़ी से उतरा, पूरा गांव चीखों से गूंज उठा। नम आंखों और पूरे सैनिक सम्मान के साथ विनीत को पंचतत्व में विलीन कर दिया गया। लेकिन अपने पीछे यह घटना कई तीखे सवाल छोड़ गई है—क्या वाकई काम के भयानक दबाव और बड़े अफसरों की तानाशाही ने एक हंसते-खेलते फौजी को मौत के मुंह में धकेल दिया? क्या विनीत की पत्नी और उसके मासूम बच्चे को कभी वह इंसाफ मिल पाएगा, जिसकी लड़ाई उन्होंने पूरी रात लखनऊ की ठंडी सड़क पर लड़ी है?

